Categories: GREENERYUrban Stories

हरित सभ्यता:  हमारा भविष्य

० विनोद शाही

     मौजूदा दौर में प्रकृति और पर्यावरण का संकट गहरा रहा है। इसके कारण हमारे सामने एक बुनियादी सवाल उपस्थित है। वह यह  कि मौजूदा आधुनिक-उत्तरानुनिक दौर का अगला चरण क्या होगा? 

     क्या अब यह कह सकते हैं कि हम ‘हरित सभ्यता’ ( ग्रीन सिविलाइज़ेशन) के मुहाने पर आ खड़े हुए हैं?

     हम आज जिस दौर में हैं, वह चाहे अनचाहे अपने हरित भविष्य की ज़रूरत को जितना हाशिये पर धकेलता है, उतना ही वह एक विकल्पहीन मालूम पड़ने लगता है। बहुत सी ऐसी परिघटनाएं है, जिनकी ओर ध्यान देंगे, तो पायेंगे कि हमारे समय में हरित सभ्यता के बीज अंकुरित और पल्लवित होने आरंभ हो गये हैं।

     इस संदर्भ में जो सवाल सबसे पहले पूछा जाना चाहिये, वह यह है कि हमारे समय की कौन सी परिघटना हमें युगांतर की दहलीज़ पर ले जाकर खड़ा कर रही है? क्या वह यह नहीं है कि हमारे समय में जीवन को बचाने का सवाल केंद्र में आ गया है? जीवन को बचाने की चुनौती – विज्ञान, राजनीति और संस्कृति –  तीनों के लिये यकसां चुनौती बन कर प्रस्तुत है?

     अब हम पूछ सकते हैं कि हमारे मौजूदा दौर के आधुनिक-उत्तराधुनिक होने का नतीजा क्या निकला था? क्या वह यह नहीं था कि मानवजाति, ईश्वर केंद्रित होने की मध्यकालीन मनःस्थिति से बाहर आकर, पहली दफा ‘मनुष्य केंद्रित’ होने की ओर आगे बढ़ी थी। पर अब जो अगला दौर सामने आने को है, वह ‘मनुष्य’ को भी केंद्र से हटा देगा। अब वह सीधे ‘जीवन’ को केंद्र में लाकर बिठाने की तैयारी करता मालूम पड़ेगा।

     सभ्यता के आधुनिक-उत्तराधुनिक विकास चरण ने जब ईश्वर की जगह मनुष्य को अपनी चिंता का केंद्र बनाया, तो वह बात बहुत सी तब्दीलियों की तार्किक निष्पत्ति थी। हुआ यह था कि विज्ञान के अभूतपूर्व विकास के कारण मानवजाति की ‘विश्व दृष्टि’ में क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ था। हमारी जो दृष्टि ‘पृथ्वी के इर्द-गिर्द घूमते सूर्य’ से फंबंध रखती थी, वह अब ‘सूर्य के इर्द-गिर्द घूमने वाली पृथ्वी’ की दृष्टि के रूप में उलट गयी थी। इससे क्या फर्क पड़ा?

     सूर्य हमें जीवन के पारलौकिक अर्थ की ओर ले जाता है। ईश्वर को परम-अरथ की तरह स्थापित करता है। पृथ्वी पर उसी से प्रकाश होता सै। उसी से जीवन। इससे जीवन की सार्थकता पारलौकिक प्रकाश को पाने से जुड़ जाती है।  ‘अयमात्मा सूर्यः’। यह था वेद से लेकर वेदांत तक का सार। मनुष्य और उसकी पृथ्वी, सूर्य की करुणा और कृपा से कृतार्थ होती थी। विज्ञान ने सोच की वह दिशा उलट दी।

____________________________________________________________________________________________________________________

Read Also: Nature Reclaims Its Glory, Ozone Layer Heals, Amidst Coronavirus Lockdown

______________________________________________________________________________________________________________________

     अब बात पृथ्वी के सूर्य के गिर्द ‘घूमने’ की हो गयी। पृथ्वी का ‘अपनी धुरी पर घूमना’ अधिक अर्थपूर्ण हो गया। बात किसी की कृपा की न रही। वह हमारे गतिशील होने की तार्किक निष्पत्ति हो गयी।

     विज्ञान की आंख से अब हम नये सत्य खोजने निकल पड़े।

     ‘श्रम’ का महत्व पहचाना गया और ‘उत्पादन’ की सामर्थ्य विकास का पैमाना हो गयी।

     ‘मानव की उत्पत्ति’ के ‘दैवी’ होने का मिथक टूट गया।

     शब्द में परम-अर्थ की तरह वह जो ब्रह्म आसन जमाये बैठा था, उसकी जगह ‘स्व’ शब्द महत्वपूर्ण हो गया और उसके साथ महत्वपूर्ण हो गयीं, स्व के भीतर मौजूद हज़ारों अर्थ-संभावनाएं।

     ‘संकेतित’ की जगह स्वयं ‘संकेत’ ने ले ली। इससे शब्द-संकेत ‘आभासी उपकरण ( वर्चुअल टंल्ज़) में बदल गये। इसने भाषा को संस्कृति के यंत्र में बदल दिया। शब्दों की ‘कूट लिपि’ ( कोड स्क्रिप्ट) को पढ़ने की कोशिश, ‘चेतना’ के नये ‘आभासी’ (वर्चुअल) रूपों का उत्पाद करने तक ले गयी।

     इससे ‘चेतना’ भी पारलौकिक और दैवी वस्तु न रह गयी। उसे ‘जीवन’ के एक अन्य तरह के ‘आयाम’ की तरह देखा जाने लगा।

     ‘मनुष्य’ को जानने समझने की कोशिश में हम उसके ‘जीन्स’ तक चले गये।

     परंतु ‘जीन्स’ की दुनिया बड़ी जल्दी मनुष्य तक सीमित न रह कर, समग्र जीवन-क्रम की ओर  रुख करने लगी।

     फिर हुआ यह कि सोच की यह तब्दीली सभ्यता के विकास को परिभाषित करने वाले बाकी रूपों पर भी लागू होने से बच न सकी।

     मनुष्य केंद्रित विकास की आधुनिक-उत्तराधुनिक अवधारणा; यंत्र, तकनीक और उच्च-तकनीक पर आधारित थी। वह प्रकृति के तमाम संसाधनों को मनुष्य के उपभोग की वस्तुओं में बदलने की ओर आगे बढ़ी थी। पर उसने आखिरकार खुद मनुष्य को भी एक उपयोगी संसाधन बना दिया।

     मनुष्य के विकासशील और प्रगतिशील होने का पैमाना यह हो गया कि वह कितना बेहतर ‘मानव संसाधन’ है। 

     मध्यकाल तक मनुष्य की चेतना और अस्तित्व का सार उसके ईश्वरीय होने में निहित था। अब वह उसकी ‘संसाधनमूलक कुशलता’ पर आधारित हो गया।

     इस कुशलता के एवज में पायी जाने वाली उपभोक्ता सुविधाओं, उसके जीवन स्तर के ऊंचे होने का सुबूत हो गयीं।

     यहां तक कि स्वतंत्रता, आनंद और मानवीय भाव तक, मनुष्य की आंतरिक प्रकृति के उद्घाटित होने की तरह नहीं, उसके द्वारा अर्जित सुविधाओं की वजह से संभव हो सकने वाली वस्तुएं हो गये।

     उपभोक्ता उत्पादों की अहमियत के इस हद तक बढ़ जाने का नतीजा यह निकला कि प्रकृति के संसाधनों के अक्षय होने का मिथक खंडित हो गया।

     प्रकृति और पर्यावरण के संकटग्रस्त हो जाने की जो स्थिति, इस वजह से सामने आयी, वह अभूतपूर्व थी। मनुष्य को पहली दफा यह अह्सास हुआ कि अगर उसे एक बुद्धिमान प्रजाति के रूप में पृथ्वी पर बचना है, तो उसे यहां मौजूद तमाम जीवन रूपों की आपसदारी के साथ बचना होगा।

     जीवन अगर संकट में पड़ता है, तो वह तमाम जीवन रूपों पर घिरने वाला संकट है। ऐसा संकट, जहां मनुष्य किसी अन्य प्रजाति से न बेहतर है, न कमतर। वह बस एक अन्य जीवन रूप है। और चूंकि प्रकृति और जीवन को संकटग्रस्त बनाने के लिये वह खुद मुख्य रूप मे ज़िम्मेवार है, इसलिये इन्हें बचाने के प्रयासों में भी, उसी की भूमिका सर्वोपरि होने वाली है।

     परंतु इस ज़िम्मेवारी के प्रति मनुष्य जितना गंभीर होगा, उतना ही वह अपनी सभ्यता के मनुष्य केंद्रित होने से ताल्लुक रखने वाले अहम् से बाहर आता जायेगा।

     जहां तक मानव जाति के अतीत से संबंधित उसकी बुनियादी जीवन शैली का संबंध है, उसे हमारे उपनिषद ‘आरण्यक काल’ के अवशेष की तरह देखते हैं।

     हमारे शास्त्रीय ग्रंथों में उस जीवनशैली का आदर्शीकरण होता है। सत्य की खोज के लिये, जिज्ञासु अरण्य में लौटते है। उतीत में हमने जो खो दिया था, उससे अपनी चेतना को समृद्ध करते हैं और फिर सामान्य जीवन में लौटआते हैं। साधकों और ऋषियों के वन में जाने से लेकर रामकथा और महाभारत में ‘बनवास’ के जो प्रसंग हैं, उनके असल अर्थ को इसी रूप में पकड़ा जा सकता है।

     हमारे ‘रामायण और ‘महाभारत जैसे महाकाव्य वन में जाने के, साधना व तप करने से जुड़े अर्थ को बदल देते हैं। वे  उसे राजवंशियों के बनवास के रूप में, एक नये अर्थ में, लोकजीवन के लिये अनुकरणीय बनाने का प्रयास करते हैं। इससे क्षत्रियों के भी तपस्वी और त्यागी होने की बात लोगों तक पहुंचती है।

     पर आज जिसे हम ‘हरित जीवन शैली’ में वापसी की बात कह सकते हैं, तो वह बहुत अलग तरह की बात है। वह अब मानवजाति की उस कोशिश का पर्याय नहीं रह गयी है,, जिसका मकसद मानवजाति को बुनियादी कुदरती जीवनशैली में लौटाने  से जुड़ा था। तब वह बात खो गये किसी बड़े सच को फिर से पा लेने की बात थी। पर अब वह मनुष्य के जीवन के ही संकटग्रस्त होकर खो जाने की आशंकाओं के निस्तारण की बात हो गयी है।

     मानवजाति अब पहली दफा इस सच के करीब पहुंच रही है कि जीवन अपने आप में एकमात्र बुनियादी सच है, जिसे बचाना ज़रूरी है।

     हम पहली दफा ‘जीवन के लिये जीवन’ के अर्थ को समझने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

     अतीत में हमने सच को पाने के जो रास्ते बनाये थे, वे सभी अंततः हमें ऐसे सच तक ले गये, जिन्हें हम जीवन से बड़ा सच कह सकते हैं। उस क्रम में हमने आत्मा, ईश्वर, धर्म, अध्यात्म, साधना और पूजा पद्धतियों जैसी चीज़ों को खोजा था।

     जीवन विविध बहुल रूपों में प्रचुर मात्रा में सब ओर विद्यमान था। इसलिये प्रकृति में लौटते हुए हमें लगता रहा कि हमें या तो प्रकृति से बड़े सच को खोजना है, या उस पर विजय पानी है।

     इन दोनों रास्तों के बीच से होकर वह जो तीसरा रास्ता निकलता था, ऊस पर हमारी निगाह पड़ती तो थी, पर टिकती न थी। वह रास्ता था, स्वयं जीवन पर केन्द्रित होने का।

     हमने यह तो देखा था कि कुदरत ने जीवन को उपजा कर कोई अद्भुत कारनामा कर दिया था। पर हम यह नहीं देख ना रहे थे कि जिसे हम परम सत्य कहते हैं, वह जीवन से ऊपर या बाहर न होकर, स्वयं जीवनमय होने का नाम है। हमारा बुनियादी सच जीवन से समग्रता में एकाकार होने से ताल्लुक रखता है। यह संभावना अब पहली दफा मानवजाति की सोच के केंद्र में आ रही है।  हम समझ पा रहे हैं कि हमारी जीवनशैली, अब प्रकृति और पर्यावरण को बचाने की बात तो खैर है ही, पर गहरे में वह जीवन की बचाने की बात है। वह प्रकृति और पर्यावरण को इस तरह बचाने की बात है कि वह उसके ‘जोवनमूलक’ होने की बात हो सके। वहां, उसके इस रूप में, वह महानतम सच छिपा है, जिसे हम सृष्टि का प्रयोजन कह सकते हैं।

______________________________________________________________________________________________________________

Read Also: How can we support sanitation workers during COVID-19?,

________________________________________________________________________________________________________________

     पृथ्वी पर जीवन के ही संकटग्रस्त हो जाने के मुख्य कारण क्या हैं? अक्सर इसके लिये पूंजीवादी औद्योगिक क्रांति और नगरीकरण के अंधाधुंध विकास को ही सीधे निशाने पर रखा जाता है। पर एक अन्य कारण भी है। वह बात सुनने में अजीब लग सकती है, पर अब हम उस ओर ध्यान देने से खुद को बचा नहीं सकते। उसका संबंध हरितक्रांति और हरित राजनीति के आधुनिक और उत्तराधुनिक रूपों से है। कृषि के संकट ग्रस्त हो जाने की एक वजह उसके जीवन केंद्रित न बने रह सकने से जुड़ी है। औद्योगिकरण के कृषि क्षेत्र में भी दखल देने के जो हालात पैदा हुए हैं, उनके कारण हरित क्रांति और हरित राजनीति तक, जीवन को बचाने वाली न रह कर, उसे नष्ट करने वाले बाज़ार तंत्र के खेल में बदल गयी है।

     हम कृषि संस्कृति और हरित क्रांति तक के संकटग्रस्त हो जाने के समय में जी रहे हैं। इसलिये वनवासी अतीत और मौजूदा दौर की हरित जीवन शैली को विकास की कड़ियों की तरह देखने का वक्त आ गया है। हमारे वक्त  में महत्वपूर्ण है, कृषि और जंगल को बचाने से ताल्लुक रखने वाली हरित जीवन शैली में एक नयी शक्ल में लौटना।

      मध्यकाल तक कृषि संस्कृति विकासोन्मुख रहती है। परंतु आधुनिक काल के आरंभ होते ही कृषि संस्कृति पर संकट के बादल गहराने लगते हैं। उधर नगरीकरण का अभूतपूर्व विस्तार होता है। कृषि पर निर्भर गांव नए बाजार के व्यावसायिक दबाव को झेल न पाने की वजह से खुद को लगातार अजनबी पन की स्थिति का शिकार होता पाते हैं। किसानी पर आधुनिक काल में जिस तरह का संकट घिरता है उसे लेकर आधुनिक काल का कथा साहित्य बहुत संवेदनशील एवं मार्मिक कथाओं को बड़े उपन्यासों की शक्ल में हमारे सामने लाता है।

     पर जिसे हम हरित संस्कृति का संकट कह सकते हैं उसका संबंध नगरों से है। औद्योगिकरण के कारण नगर कंक्रीट के जंगलों में बदलते हैं। प्रकृति से उनकी अलहदगी उन्हें हरित जीवन शैली में वापसी के लिए पुकारती दिखाई देने लगती है। बाज़ार से पिछड़ रहे गांव को विकसित करने के लिए प्रयास किए जाते हैं। किसानी को एक नई हरित क्रांति की ओर मोड़ा जाता है। परंतु आधुनिक तौर-तरीकों की मदद से खेती बाड़ी की स्थिति को सुधारने की बात गांव को जिस तरह की हरित क्रांति की ओर ले जाती है, वह वहां की कृषि संस्कृति को प्रभावित तो करती है रूपांतरित नहीं करती। यानी हम हरित क्रांति तक तो पहुंचते हैं, परंतु वह हमारी ‘हरित जीवन शैली’ नहीं बन पाती।

     हरित जीवन शैली का संबंध शहरी मध्यवर्ग की जरूरत से अधिक है। औद्योगिकरण की वजह से बढ़ते प्रदूषण के कारण प्रकृति को बचाने की ज़रूरत शहरों को इसलिए अधिक है क्योंकि वहां रहने वालों के लिए अब सांस तक लेना दूभर होता जा रहा है। हमारे समय में जब कृषि संस्कृति अलग तरह के संकट से जूझ रही है, तब उसके पास अपने हालात से उबरने का एक ही रास्ता बचा है वह यह है कि उसे नगरों में उपस्थित  हो रहे हर संकट से संबंधित हालात का समर्थन मिले।

     जहां तक आधुनिक काल के किसानी से संबंधित उपन्यासों का संबंध है वहां कृषि संस्कृति और उससे जुड़ी जीवन शैली के संकटग्रस्त हो जाने की परिस्थितियों का ही मार्मिक चित्रण है। परंतु यह उपन्यास जब गांव और शहर के बीच के रिश्ते की बात करते हैं तब यह स्पष्ट होने लगता है कि वहां भी हरित जीवन शैली की और समाज के आगे बढ़ने की जरूरत का पूर्वाभास मौजूद है। हरित संकट तो अब प्रकट हो रहे उत्तर आधुनिक समाज को हरित राजनीति की ओर भी धक्के ले लिए जा रहा है आधुनिक काल के उपन्यासों को पढ़ते हुए हम कृषि संस्कृति और मौजूदा दौर की हरित राजनीति के बीच के रिश्तो को समझने के लिए एक जमीन बनती देख सकते हैं। इस संदर्भ में इन उपन्यासों का पूनम पाठ अब जरूरी हो गया है।

     किसानी को एक बड़े सृजन विमर्श के रूप में जिन उपन्यासों में हमारे सामने रखा है उनमें अगर  चार को चुनना हो, तो मैं लिओ टॉलस्टॉय के अन्ना करेनिना, अर्नेस्ट हेमिंग्वे के द ग्रेप्स आफ रैथ, पर्ल स बक के द गुड अर्थ तथा प्रेमचंद के गोदान को चुनूंगा। आधुनिक काल में प्रवेश करने के साथ-साथ किसानी वैश्विक स्तर पर संकटग्रस्त हुई है। इस बात को हम इन उपन्यासों से होकर गुजरते हुए बड़ी आसानी से समझ सकते हैं। हमारे दौर में उसके बेहद त्रासद परिणाम सामने आ रहे हैं। एक लंबे अरसे से पिछले समीर में किसानों के द्वारा आत्महत्या करने के अनुपात में इतनी वृद्धि होती चली गई है के किसानों के प्रति समाज की  संवेदनशीलता को देखकर मन अवसाद में डूबता है जाता है। मौजूदा किसान आंदोलन के परिप्रेक्ष्य में देखें गे तो कह सकते हैं के हम इस और संवेदनशीलता से अगले दौर में जिसे हम हृदय हीनता का दौर कह सकते हैं, प्रवेश कर चुके हैं। यह आंदोलन पहले किसानों को अपनी शहादत देने की ओर ले गया जिससे हम आत्महत्या का उदात्त और सामाजिक प्रतिरोध वाला रूप कह सकते हैं फिर वहां से यह आंदोलन अब अपने राजनीतिक प्रतिरोध के अंतर्गत ठंड की ओर मुर्ता दिखाई दे रहा है।  यह सब जो कुछ घट रहा है उसका सृजन आख्यान में बदलना अभी बाकी है। किसानों के अंतरंग जीवन परिवारों तथा उनके परिवेश में इस सब के कारण जो परिवर्तन आए हैं वह सब एक बड़े सृजन मुल्क संघर्ष से उठने वाली अभिव्यक्ति की इंतजार में है। वह अभिव्यक्ति कैसी होगी इसके बारे में फिलहाल कुछ भी नहीं कहा जा सकता परंतु हम इससे पहले के उस सृजन परिदृश्य में लौटकर अपने समय में पढ़ती उनकी छाया हो को अवश्य अनुभव कर सकते हैं वहां वह सब जो हमारे समय के लिए महत्वपूर्ण है उसे एक नई दृष्टि के साथ फिर से पढ़ना और एक नई व्याख्या के द्वारा उस सब को फिर से रचना जरूरी हो गया लगता है। आइए इसके लिए एक प्रयास करते हैं।

     साहित्यिक कृतियों के मर्म में प्रवेश करने के लिए हमें उनके विषय वस्तु की ओर ही ध्यान देने की जरूरत नहीं, अपितु उन छोटी-छोटी बातों की वह भी देखना पड़ता है जिन की रोशनी में वह विषय वस्तु अचानक अपने मर्म को प्रकट करती हुई आलोकित हो उठती है। विषय वस्तु के तल पर हम इन चारों उपन्यासों के बारे में यह सामान्य बात कह सकते हैं कि इन में किसान जीवन के ऊपर लहराते संकट के बादल बहुत करुणा एवं मार्मिक  आख्यानों में बदल गए हैं। इससे यह उपन्यासों के महत्व पर तो प्रकाश पड़ता है परंतु हमें उनकी आत्मा तक पहुंचने का रास्ता तो इन कृतियों में गहराई के साथ उतरते हुए स्वयं खोजना पड़ता है। जिओ टॉलस्टॉय के उपन्यास अन्ना करेनिना को पढ़ते हुए इस तरह की एक पंक्ति मुझे तब दिखाई दी जब इस प्रयास का एक पात्र दूसरे से यह कहता है: “मैं तुम्हारे हर शब्द को, यहां तक कि हर एक भंगिमा को, ना कभी भूल सकता हूं ना भूलूंगा।” ऊपर से देखने पर यह पंक्ति एकदम साधारण लगती है। परंतु ऐसा है कहीं। प्रेम में होना एक बात है, परंतु प्रेम में इस कदर गर्क हो जाना दूसरी बात। जिससे हम नगर और महानगर का जीवन कहते हैं उसमें हमने प्रेम करने की इस दीवानगी को लगभग को दिया है। किसान जीवन के साथ गांव का एक कुदरती परिवेश स्वता वहां मौजूद हो जाता है।

________________________________________________________________________________________________________________

Also read: World Meteorological Day celebrates the ocean, our climate and weather

__________________________________________________________________________________________________________________

परिवेश का कुदरती होना भी एक बात है उसके साथ एकाकार उस जीवन की बात दूसरी है जिस के व्यवहार में ऐसे कुदरती रूपों को अभिव्यक्त होता पाते हैं जिनसे प्रेम सहज स्वाभाविक रूप में दूसरे को अनिवार्य रूप में अपना बना लेने की हद तक जा सकता है। शहर हमें परिवेश से ही नहीं तोड़ता मनुष्य से तथा हमारे अपने सोचने और महसूस करने के कुदरती रूपों से भी अजनबी बनाता है। इसलिए जब हम किसान जीवन की बात करते हैं तो हमें सबसे पहले यह देखना होगा कि उसके भीतर की दुनिया में जिस तरह के पात्र दिखाई देते हैं वह अपने सोचने समझने और महसूस करने के धरातल पर कुदरती जीवन शैली के कितने करीब है वह जितने अपने इस कुदरती रूप के करीब होंगे उनसे अजनबी होकर अलहदा होना उन्हें उतना ही त्रासद तथा अमानवीय प्रतीत होने लगेगा। जब अब मौजूदा दौर में किसान के आधुनिक और उत्तर आधुनिक ना हो पाने अपनी उत्पादन पद्धतियों में बाजार की उपेक्षा करने तथा अर्थ तंत्र के मांग और आपूर्ति के सिद्धांतों के मुताबिक न चलने की शिकायत करते हैं तो हम यह समझ नहीं पाते के किसान जब तक अपने कुदरती परिवेश से अपने आप को अलहदा करने की सोच समझ और अनुभूति वाली बात तक नहीं पहुंच जाता उसके लिए ऐसा करना कितना कठिन है यह सब करना उससे अपनी आत्मा को खो देने के बराबर लग सकता है। इस गहरे अर्थ को समझते हुए ही हमें किसान जीवन के इन बड़े उपन्यासों के संसार में प्रवेश करना चाहिए।

Tags: #culture, #environment, #future, #getgreengetgrowing, #gngagritech, #green, #greencivilization, #greenstories, #life, #ourfuture
Vinod Shahi

Recent Posts

Dehorning Rhinos Curbs Poaching, New Study Finds

Researchers in South Africa find that cutting the animals’ horns( Rhinos) reduces poaching by almost…

1 day ago

Wooden structure discovered that was built 300,000 years before Homo sapiens

  Archaeologists working at Kalambo Falls in northern Zambia have uncovered two large wooden logs…

2 days ago

World’s longest evolution experiment started 37 years ago, but has already seen 80,000 generations

  E. coli experiment started in 1988 to see evolution in real-time. Photograph: (CDC) Story highlights…

2 days ago

Satellite Sentinel-5A Captures Startling New Images of Earth’s Ozone Hole

Sentinel-5A satellite shows the real story behind earth’s ozone hole and pollution, see the first…

2 days ago

New plant-based plastic decomposes in seawater without forming microplastics

Japanese researchers used salt-sensitive chemistry to rethink how plastics should degrade at sea.   Bag…

3 days ago

Algae-based asphalt shrugs off freezing temperatures and reduces carbon output

A new algae-based binder makes asphalt tougher in freezing temperatures while pushing roads toward carbon…

3 days ago

This website uses cookies.