
क्या जरूरत है? तुम तुम जैसे हो; दूसरा दूसरा जैसा है।यह अड़चन हम उठाते क्यों हैं ?
पौधे नहीं उठाते। छोटीसी झाड़ी बड़े से बड़े वृक्ष केनीचे निश्चिंत बनी रहती है; कभी यह नहीं सोचती कि यह वृक्ष इतना बड़ा है।छोटासा पक्षी गीत गाता रहता है! बड़े से बड़ा पक्षी बैठा रहे ,इस से गीत में बाधा नहीं आती कि मैं इतना छोटा हूं , क्या खाक गीत गाऊं ! पहले बड़ा होना पड़ेगा।छोटे से घास में भी फूल लग जाते हैं; वह फिक्र नहीं करता कि इतने-इतने बड़े वृक्षों के नीचे फूल उगाने कीकोशिश कर रहे हैं ,न कि पगला हो गए हैं ! पहले बड़े हो जाओ;फिर फूल लाना। नहीं , प्रकृति में तुलना है ही नहीं; सिर्फ आदमी के मन में तुलना है।
तुलना इस लिए है कि हम–और सारी मनुष्यता–एक गहन दौड़ से भरी है।
उस दौड़ का मतलब यानिं कि शक्ति की आकांक्षा। कैसे मैं ज्यादा शक्ति वान हो जाऊं !फिर चाहे वह धन हो,पद हो , प्रतिष्ठा हो ,यश हो, कुशलता हो, कुछभी हो।कैसे मैं शक्ति शाली हो जाऊं, यही मनुष्य की सारी दौड़ का आधार है।
आज तक कोई भी व्यक्ति ऐसी जगह नहीं पहुंच पाया जहां वह कह सके कि शक्ति की मेरी आकांक्षा तृप्त हो गई।जो कभी नहीं हुआ वह कभी होगा भी नहीं।
मनुष्य को औसत में जीना चाहिए; तो हम इतने ज्यादा पीड़ित न होंगे।
जिसने प्रतिस्पर्धा की, वह सदा पाएगा कि हार गया।लेकिन जो पीछे होने को राजी होग या, जीवन की इस व्यर्थ दौड़ को देखकर, समझकर, ध्यानसे जो पीछे खड़ा हो गया, और जिसने कहा हम दौड़ते नहीं आगे हो नेको, एक अनूठा चमत्कार घटित होता है कि जो आगे होने की दौड़ में होते हैं वे हीन हो जाते हैं और जो पीछे खड़े हो जाते हैं उनकी श्रेष्ठता की कोई सीमा नहीं है।
पीछे हम खड़े ही जैसे होते हैं वै सेही श्रेष्ठ हो जाते हैं, हीनता मिट जाती है।
तौलते ही नहीं किसी से,पीछे, सबसे पीछे ही खड़े हो गए, अपने हिसाब से खड़े हो गए, अपने हाथ से ही संघर्ष छोड़ दिया और पीछे आगए, अब तो हीनता का कैसे बोध होगा? हीनता का घाव भर जाएगा ;और श्रेष्ठता के फूल उस घाव की जगह प्रकट होने शुरू हो जाएँगें।श्रेष्ठ केवल वे ही हो पाते हैं जो श्रेष्ठ होने की दौड़ में नहीं पड़ते।और हीन से हीनतर होता जाता है मनुष्य, जितनी ही दौड़ में पड़ता है।
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