
लखनऊ, [रामांशी मिश्रा]। जलवायु परिवर्तन इस समय की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। सबसे अधिक मार समुद्रों पर पड़ रही है। बढ़ते समुद्री जल स्तर से दुनिया के कई इलाकों पर जलमग्न होने का खतरा मंडरा रहा है। यह खतरा इसलिए और बढ़ गया है, क्योंकि जल और स्थल के बीच प्राकृतिक रक्षा कवचकी भूमिका निभाने वाले मैंग्रोव वनों की खुद की सुरक्षा संकट में है। मैंग्रोव वनों के अस्तित्व पर आ रहे इस संकट की बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान (बीएसआइपी) ने व्यापक पड़ताल की है।
________________________________________________________________________
Read Also : Not So Fast: Why India’s Plan to Reintroduce Cheetahs May Run Into Problems
________________________________________________________________________
संस्थान के वैज्ञानिकों ने छह हजार वर्ष पुरानी मैंग्रोव की प्रजातियों के जीवाश्म और विभिन्न क्षेत्रों में मौजूद वर्तमान प्रजातियों के अध्ययन में पाया है कि 2070 तक मैंग्रोव की 50 प्रतिशत से अधिक प्रजातियां विलुप्त हो जाएंगी। बीएसआइपी का यह शोध प्रख्यात अंतरराष्ट्रीय विज्ञान पत्रिका इकोलाजिकल इनफार्मेटिक्स में नवंबर में प्रकाशित हुआ है। इस शोध में शामिल वैज्ञानिक डा. ज्योति श्रीवास्तव के अनुसार, जलवायु परिवर्तन, वर्षा और समुद्र के स्तर में परिवर्तन और तापमान में लगातार वृद्धि के कारण मैंग्रोव वनों में भूमि की ओर स्थानांतरण बढ़ रहा है। देश के दक्षिण पश्चिम में दक्षिण पूर्व में कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और आंध्र प्रदेश के तटीय इलाकों में मौजूद मैंग्रोव के पेड़ों पर ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन का सबसे अधिक असर दिख रहा है।
मैंग्रोव की महत्ता
- मैंग्रोव वन असल में एक ऐसी प्राकृतिक ढाल की तरह होते हैं, जो समुद्र में गिरने वाली नदियों के मुहाने पर प्राकृतिक रूप से उगते हैं।
- यह समुद्री तूफानों सुनामी और अन्य आपदाओं से बचाने में सहायक की भूमिका निभाते हैं। यह वन समुद्र और पृथ्वी तल के बीच के बफर जोन का भी काम करते हैं जिससे मिट्टी का कटाव और अपक्षरण नहीं होता।
- 2004 दिसंबर में हिंद महासागर में आई प्रलयंकारी सुनामी का उन कई इलाकों में कम असर देखा गया था, जहां पर मैंग्रोव वनों की प्रचुरता पाई जाती है।
- डा. ज्योति ने बताया कि वर्तमान में मैंग्रोव की दो ऐसी प्रजातियां हैं जो एक बड़े भूभाग में फैली हुई हैं। ये राइजोफोरा म्युक्रोनेटा और एवीसीना ओफिसिनेलिस हैं।
________________________________________________________________________
Read Also : SHOULD WE CONSERVE HYBRIDS?
________________________________________________________________________
- अध्ययन में पाया गया है कि भारत के दक्षिण और पूर्वी तटों पर इन प्रजातियों पर खतरा मंडरा रहा है। ऐसे में इन वनों के दायरे के सिकुड़ने पर चिंतित होना स्वाभाविक है।
- इस अध्ययन के लिए मैंग्रोव वनों पर हुए कई शोध के जीवाश्म के परागण आदि के निष्कर्ष निकाले गए।
- इस आधार पर पाया गया कि इन दोनों प्रजातियों का भारत के समुद्र तटों में बेहतर विकास हो रहा था।
तापमान में लगातार वृद्धि और वर्षा में गिरावट इसका कारण
जलवायु परिवर्तन की स्थिति के साथ शोधार्थियों की टीम ने पिछले शोध के निष्कर्षों की तुलना गोदावरी, कावेरी और महानदी डेल्टा में पाए गए मैंग्रोव वनों से विश्लेषण किया। इसमें पाया कि वर्तमान में मैंग्रोव वन नष्ट हो रहे हैं। ग्लोबल वार्मिंग, तापमान में लगातार वृद्धि और वर्षा में गिरावट इसका कारण है। भविष्य की पर्यावरणीय स्थितियों का अंदेशा लगाने पर यह पाया गया है कि ग्रीन हाउस गैसों और तापमान के 3.7 डिग्री सेल्सियस यानी 2100 सेंटीग्रेड तक बढ़ने पर 2070 तक इन प्रजातियों का विकास होना मुश्किल होगा।डा. ज्योति के अध्ययन के निष्कर्ष को मानें तो मैंग्रोव को विकास के लिए एक इकोसिस्टम चाहिए होता है। इसके लिए कूड़ा- कचरा भी नदी में फेंकना रोकना होगा। पर्यावरणीय प्रभाव को कम करके ही मैंग्रोव प्रजातियों के विकास को बढ़ाया जा सकता है। इस शोध में डा. ज्योति के साथ डा. पुजारिनी समल, डा. एसआर सिंगरासुब्रमण्यम, डा. पूजा नितिन सर्राफ और डा. बिपिन चार्ल्स शामिल रहे।
NOTE – This article was originally published in jagran and can be viewed here
Tags: ##ocean, #climate, #climatechange, #climatecrisis, #climaterisk, #environment, #getgreengetgrowing, #gngagritech, #greenstories, #nature

