
जीवन एक सतत प्रक्रिया है। इसकी निरन्तरता और इसका प्रवाह ही इसे जीवन्त बनता है। चल और अचल के मध्य ही जीवन को सीमित किया जा सकता है। कभी कभी यह लगता है की जीवन इतना निर्दयी क्यों हैं ? क्यों इस समाज मे , इस पूरे विश्व मे इतनी विषमताएं , जटिलताएं और विभिन्नताएं हैं। क्या साधारण स्वरुप में , परिवेश मे और वैचारिकता मे इस जीवन के सभी सिरों को एक दूसरे से बांधा नहीं जा सकता। क्या जीवन के पीछे कोई अचिन्हित और अनूठा उद्देश्य हैं जिसे समझना कठिन हैं। यदि इस जीवन के उद्देश्य को पूर्ण बनाना हैं तो जीवन की विषमताओं और उसमें पल पल आने वाली असीम कठिनाइयों को एक शिक्षण संस्थान मे चल रहे पाठ की तरह लेना होगा।
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जीवन की कठिनाइयों से कैसे निपटा जा सकता हैं ? क्या हैं इसका सही रास्ता ? क्या कभीं कठिनाइयों को आने से रोक सकते हैं ? आखिर मे कठिनाइयों से क्या भविष्य की अनिश्चितताएं को असुरक्षापन का एहसास कराती हैं। जिन्हे हम कठिनाइयों में परिवर्तित कर लेते हैं। जीवन कभी निश्चित हो सकता हैं ? असंभव। अनिश्चितता सबसे बड़ी निश्चितता हैं। जब हम इस तथ्य को समझ लेते हैं तो जीवन मे एक स्थिरता आना प्रांरभ हो जाती हैं। क्या कभी दरिया के प्रवाह को बांधा जा सकता हैं ? स्वछन्द बहता दरिया ही वास्तविक जिंदगी है। क्या समुंदर की लहरों को नियंत्रित किया जा सकता हैं ? इसी तरह वैचारिक सीमाएं जीवन को बंधन में बांध कर कठिनाइयों की पूरी फसल खड़ी कर देती हैं।
जीवन मे कठिनाइयां एक अवधारणा के इतर पर कुछ भी नहीं है। अगर जीवन में उतार चढ़ाव न हो तो क्या हम कभी अपनी कर्मइन्द्रियों का कभी भी इस्तेमाल करेंगे ? जब सब कुछ अपने आप ही आसानी से होना शुरू हो जाये तो , हम कभी अपने व्यक्तित्व के विशेष तत्वों का उपयोग करना सीख पाएंगे। यह जीवन के व्यवधान ही हमे अपनी विशेषताओं से परिचित कराते हैं। बिना पसीना बहाये , बिना बारिश में नहाये और बिना सर्द हवाओ को सहे खेत में फसल पैदा नहीं की जा सकती।
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विषम परिस्थितियो में हम नकारात्मक विचारो को उत्सर्जित करते हैं। क्योकि हम परिस्थिति को उसी स्वरुप में देखते हैं , इसीलिए उसे कठिन व असामान्य समझ बैठते हैं। वास्तव मे प्रकृति हमे जीना सीखा रही हैं। यह तो प्रकृति की केवल पाठशाला हैं , जिसमे सामान्य और असामान्य घटनाये बराबर घटित होती रहती हैं। बदलाव प्रकृति का स्वभाव हैं। हम ही उसे कठिन व आसान बना देते हैं क्योकिं उस विशेष परिस्थिति में हम वैसा महसूस करते है।
प्रकृति अपनी पाठशाला में पढ़ाती हैं की कैसे हम अपनी प्रतिभाओं को पहचानें और विषम तथा असामान्य परिस्स्थितियो में उसका प्रयोग करके अपने जीवन को सामान्य रखें । प्रकृति और जीवन कभी कठिन नहीं होता केवल हमारी कमजोरियां और हमारे विचार उसे ऐसे असामान्य रूप से देखने में मजबूर करते हैं। प्रकृति ने हर एक मनुष्य को एक विशेष प्रतिभा से सुसज्जित किया हैं जिसको प्रयोग करके वह किसी भी परिस्थिति को अपने आवश्कताओ के अनुरूप ढाल सकता हैं | आवश्कता हैं एक सच्चे प्रयास की और अटूट विश्वास की | प्रकृति तो बहुत दयालु हैं जो हर विषम परिस्थिति में एक अवसर पेश करती हैं जिसको हम स्थिर रह कर ही पहचान पाते है।
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अंत में विषम या असामान्य परिस्थिति एक अवधारणा से अधिक कुछ भी नहीं है। इस प्रकार प्रकृति हमें अपनी अति विशिष्ट प्रतिभाओं को पहचानने का व उसे प्रयोग करने का हमे एक अवसर देती रहती हैं। हमें स्वयं पर विश्वास को और प्रयास को कभी अस्थिर नहीं होने देना चाहिए। उस कठिन परिस्थिति को समाप्त होने मे ज्यादा समय नहीं लगेगा । हमे विषम परिस्थिति के समाधान के लिए काम करना चाहिए , न की उसका हिस्सा बन कर अपने आपको कमजोर करना चाहिए |

