
Image Courtesy – Nik Shuliahin (unsplash.com)
जी हाँ,
1)पराली का धुआँ अगले पचास साल तक आपका दम घोटता रह सकता है।
2) कोरोना के अलग अलग वेरिएंट, डेंगू, अलग अलग बुखार और इंफेक्शन आपके अगले पचास साल तक ऐसे ही घेरे रहेंगे। आप बीमार, ज्यादा बीमार और बार बार बीमार होते रहेंगे और वेवक्त मौतें अब आम बात हो जाएगी।
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3) अगले पचास साल ऐसे ही ग्लेशियर पिघलते रहेंगे और समुद्र तटों को निगलता रहेगा।
4) अगले पचास साल ऐसे ही जैव ईंधन( तेल , गैस, कोयला आदि) हमारी धरती का ताप बढ़ाते रहेंगे और ऐसे ही हम भोजन में मांस खाते रहेंगे। जिससे धरती उबलती रहेगी, आसमान से बेवक्त तूफानी बारिश और ज्यादा और ज्यादा बरसती रहेगी। कहीं सूखा, कहीं बाढ़, कहीं चक्रवात, कहीं तूफान, कहीं भूकंप , कहीं बर्फबारी ज्यादा और ज्यादा आएंगे और कहीं जंगलों में आग ज़्यादा और ज़्यादा लगती रहेगी।
5) अगले पचास साल फसल चक्र बिगड़ा रहेगा, खाधान्न उत्पादन घटता जाएगा, भुखमरी और बेरोजगारी बढ़ती जाएगी।
6) अगले पचास साल दुनिया में माइग्रेशन तेजी से बढ़ेगा क्योंकि जमीन पानी में डूबती जाएगी और तटवर्ती लोगों के पास रहने के लिए जमीन ही नहीं बचेगी।
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यह मैं नहीं कह रहा बल्कि क्लाइमेट चेंज पर संयुक्त राष्ट्र द्वारा ग्लासगो में आयोजित 240 देशों के COP- 26 सम्मेलन के निष्कर्ष हैं। जिसमें सन 2070 तक कार्बन उत्सर्जन को पूर्व के स्तर पर लाने और धरती का तापमान 1.5 डिग्री से अधिक न बढ़ने देने के लिए संकल्प व्यक्त किया गया है। हो सकता है तब तक दुनिया कुछ टापुओं में बदल जाए और दुनिया की मात्र दस प्रतिशत आबादी ही शेष बचे। जबकि पर्यावरणविदो का मानना है कि अपना अस्तित्व बचाने के लिए “दुनिया को 2050 तक शून्य उत्सर्जन के लिए, चीन को 2040 तक और ओईसीडी देशों को 2030 तक उत्सर्जन शून्य करना होगा। यही कारण है कि शून्य उत्सर्जन का लक्ष्य असमान है और जलवायु परिवर्तन से निपटने को अस्पष्ट एवं अप्रभावी बनाता है। तो सभी देश अपेक्षित बदलाव क्यों नहीं करना चाहते? क्या उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और जीडीपी आधारित विकास के लालच ने मानवता को निगलने की तैयारी तो नहीं कर ली है? तो क्या दुनिया के नेता अपने अपने देशों की जनता को मौत के मुँह में धकेल रहे हैं?
अनुज अग्रवाल
अध्यक्ष, मौलिक भारत
संपादक, डायलॉग इंडिया
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