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डॉ. वेदप्रताप वैदिक
दिल्ली के ‘सेंटर फार पाॅलिसी रिसर्च’ ने अभी-अभी हमारी विदेश नीति पर एक गंभीर शोध-पत्र प्रकाशित किया है। इसे तैयार करनेवाले विशेषज्ञों में ऐसे लोग भी शामिल हैं, जो कि बरसों-बरस हमारे विदेश मंत्रालय का संचालन करते रहे हैं। उन्होंने इस शोध-पत्र में विदेश नीति के कई पहलुओं का विश्लेषण किया है और उन्हें बेहतर बनाने के सुझाव भी दिए हैं। जिस पहलू पर मेरा ध्यान सबसे ज्यादा गया है, वह है- हमारी पड़ौसी नीति!
पड़ौस याने क्या ? वे देश जो भारत के पड़ौस में स्थित हैं। इन देशों में दक्षेस (सार्क) के सभी आठों देश आ जाते हैं। भारत के अलावा अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका, भूटान और मालदीव इसके सदस्य हैं। जब 1985 में दक्षेस (दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संघ) बना, तब अफगानिस्तान इसका सदस्य नहीं था। जैसे बाद में अफगानिस्तान को सदस्य बनाया गया, वैसे ही मैं सोचता हूं कि म्यामांर और ईरान को भी इसका सदस्य बनाया जाना चाहिए। सदियों से अराकान से खुरासान का यह इलाका आर्यावर्त्त के रुप में जाना जाता रहा है। दक्षिण एशिया का यह विशाल क्षेत्र आज भी सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से एक बड़े परिवार की तरह है।
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दक्षिण एशिया के सभी देशों की आजादी के बावजूद यहाँ यूरोपीय संघ या एसियान की तरह कोई क्षेत्रीय संगठन बरसों तक नहीं बना लेकिन 1985 में जब बांग्लादेश के राष्ट्रपति जिया-उर-रहमान ने पहल की तो भारत के लगभग सभी पड़ौसी देश सहमत हो गए लेकिन भारत को पहले से अंदाज था कि भारत-पाक तनातनी इस संगठन का सबसे बड़ा सिरदर्द साबित हो सकता है। तीन दशक तो इस संगठन ने जैसे-तैसे काम चलाया लेकिन 2014 में जबसे पाकिस्तान इसका अध्यक्ष बना है, भारत ने इसके शिखर सम्मेलन में भाग ही नहीं लिया है। ‘सार्क’ के संविधान के मुताबिक शिखर सम्मेलन तब तक नहीं हो सकता, जब तक कि प्रत्येक सदस्य उसमें भाग न ले।
भारत को डर था कि इस संगठन का दुरुपयोग करने में पाकिस्तान कोई कसर नहीं छोड़ेगा। इसीलिए उसने इसके संविधान में यह प्रावधान करवा दिया था कि कोई भी सदस्य राष्ट्र इसमें द्विपक्षीय आपसी मामले नहीं उठाएगा। लेकिन द्विपक्षीय मतभेद के कारण ही अब दक्षेस लगभग निष्क्रिय हो गया है। यदि भारत ने दक्षेस के बदले अब पूर्व के सात देशों— बांग्लादेश, भूटान, भारत, नेपाल, श्रीलंका, म्यांमार और थाईलैंड को लेकर ‘बिम्सटेक’ संगठन खड़ा कर लिया है तो पाकिस्तान भी कम नहीं है। उसने पिछले डेढ़ साल में कोरोना के नाम पर चीन के साथ मिलकर पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका की चार बैठकें बुला ली है। ये सारे देश चीन के ‘रेशम महापथ’ (सीपेक) के समर्थक हैं। इन सब देशों ने मिलकर यह संकल्प भी लिया है कि दक्षिण एशिया में चीन की मदद से ये गरीबी-उन्मूलन और विकास के कार्यक्रम भी चलाएंगे।
यदि भारतीय विदेश नीति इस वक्त सक्रियता नहीं दिखाएगी तो मुझे आशंका है कि ये सब देश मिलकर चीन को कहीं दक्षेस (सार्क) का सदस्य बनाने की पहले ही न कर डालें। यों भी चीन नेपाल में रेल की लाइन डालने और पेशावर-काबुल रेल्वे बनाने का भी जिम्मा ले सकता है। पाकिस्तान जैसे कभी अमेरिका का दामन थामे हुआ था, आजकल वह चीन की नाक का बाल बना हुआ है। चीन आजकल काबुल में तालिबान की गड़बड़झाला सरकार को जो दिल खोलकर मदद दे रहा है, उसके पीछे चीन-पाक गठबंधन ही है। चीन ने ईरान पर भी अपनी गलबहियाँ डाल रखी हैं, क्योंकि परमाणु मुद्दे पर अमेरिका और ईरान के बीच अभी अविश्वास की खाई भरी नहीं है।
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नेपाल और श्रीलंका पर चीन ने अपना सिक्का जमा रखा है। भारत के ये दोनों पड़ौसी चीन के रेशम महापथ पर तो पहले से ही फिसले जा रहे हैं, इधर भारत के साथ इनके संबंधों में इसलिए भी ढीलापन आ गया है कि इन दोनों देशों में अमेरिका की मदद से बननेवाली सड़कों की योजना भी रद्द हो गई हैं। माना यह जा रहा है कि ये दोनों प्रायोजनाएं चीन-विरोधी हैं। अमेरिका के बढ़ते प्रभाव का अर्थ भारत की पकड़ का मजबूत होना लगाया जा रहा है। जहाँ तक म्यांमार का सवाल है, पिछले 20-25 वर्षों में चीन ने इस बौद्ध देश की अर्थ-व्यवस्था पर कब्जा-सा कर लिया है। इसके साथ उसका व्यापार 1.4 बिलियन डाॅलर का है। चीन बर्मी तेल और गैस लाने के लिए रेल और पाइप लाइनें बिछा रहा है। वहाँ बिजली-उत्पादन के लिए वह अरबों रु. लगा रहा है।
दूसरे शब्दों में चीन की कोशिश है कि भारत को वह चारों तरफ से घेर ले। उसके सभी पड़ौसी राष्ट्र चीन के चप्पू बन जाएं। चीन की यह रणनीति गलवान घाटी की मुठभेड़ से भी ज्यादा खतरनाक है। इसका मुकाबला करने के लिए ‘सेंटर फार पाॅलिसी रिसर्च’ के शोधपत्र में कई सुझाव दिए गए हैं। उनमें से एक यह भी है कि पाकिस्तान से भारत बात शुरु करें। हमारी पाकिस्तान-नीति हमारी घरेलू राजनीति के सांप्रदायिक आधार पर तय नहीं होनी चाहिए। यदि अफगान-संकट को दोनों देश मिलकर हल करें तो कश्मीर का मामला भी सुलझ सकता है।
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हमारी सरकार के अपने कुछ ठोस तर्क हो सकते हैं, इस रास्ते के विरुद्ध! लेकिन ऐसा है तो मैं समझता हूं कि यह बिल्कुल सही समय है जबकि भारत और पड़ौसी राष्ट्रों के प्रबुद्ध नागरिकों को मिलकर एक नए संगठन ‘जन-दक्षेस’ (पीपल्स सार्क) की स्थापना की जानी चाहिए और उसमें मध्य एशिया के पांचों-राष्ट्रों को भी जोड़ लेना चाहिए ताकि संवाद-भंग की स्थिति खत्म हो और दो अरब लोगों का यह आर्य-परिवार संपन्न और सुखी बन सके।
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