
Pic courtesy – https://public-health.uq.edu.au/article/2021/04/urgent-need-safeguard-mental-health-climate-change
एस के अग्रवाल
ऑफ़िस से शाम साढ़े पांच बजे के करीब लौटा। मेरे हाथ में चाय की कप थी, दिन भर की प्रमुख खबरों को जानने के लिए टीवी चलाया। पहली ख़बर शिकागो में हुई गोलीबारी में नौ लोगों की मौत की थी। फिर सेना और आतंकवादियों के बीच भीषण मुठभेड़, स्कूल जा रही एक सत्रह साल की लड़की को चाकू मारने, रोडरेज के एक मामले में दो की गिरफ्तारी, एक पार्टी के तीन कार्यकर्ताओं को गोली मारने, गला काटने और दूसरी पार्टी पर उंगली उठाने और दोषारोपण के साथ-साथ एक धार्मिक संगठन द्वारा दूसरे धर्म के प्रवक्ता को धमकी देने की। एक-एक के बाद एक ख़बरें आती रही और फिर इन्हीं विषयों को लेकर टीवी चैनल पर आधुनिक बौद्धिक पैनलिस्टों द्वारा उत्तेजक और तर्कपूर्ण चर्चा शुरू हो गई। इस चर्चा में हर व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के प्रति अनादर की भावना से लबरेज़ दिख रहा था। गहमागहमी की स्थिति ऐसी कि मानो सब लोग एक दूसरे पर फटने के लिए पहले से ही तैयार बैठे हों। इस पूरे वातावरण में शिकायत, असंतोष, आरोप और संवेदनहीनता व्याप्त सब कुछ व्याप्त है। दूर-दूर तक ना तो कोई सत्य है और ही संयम दिखाई दे रहा है, ज़ाहिर सी बात है आजकल हम जिस माहौल में रह रहे हैं, उसमें कुछ तो गड़बड़ है।
_______________________________________________________________________
Read Also : Monsoons Cause Havoc in India as Climate Change Alters Rainfall Patterns
________________________________________________________________________
एक तरह से देखा जाए तो अभी तक ग्लोबल वार्मिंग और मानव व्यवहार को लेकर कोई गहरा अध्ययन नहीं हुआ है पर जिस तरह बदलता से बदलता वातावरण मानव जीवन को प्रभावित कर रहा है उसे देखकर मैं इस बात को मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि इनके बीच निश्चित रूप से, कोई ना कोई सीधा संबंध है। हम विचार करें तो पाएंगे कि आज का जो वातावरण है वह किसी और नहीं बल्कि हम इंसानों के द्वारा बनाया गया है, जहां एक इंसान दूसरे इंसान के खून का प्यासा दिखाई दे रहा है। यह जो बदलाव आया है वह जलवायु परिवर्तन के सबसे महत्वपूर्ण हिस्सों में से एक है। इस तरह के जलवायु परिवर्तन और मानव व्यवहार से पता चलता है कि कैसे गर्म तापमान और नित्य गंभीर होती मौसम की स्थिति प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लोगों के सोचने और बातचीत करने के तरीके को बदल रही है जो सिर्फ़ टीवी ही नहीं बल्कि आजकल लोगों के सामान्य जीवन और व्यवहार में भी नजर आने लगा है।
एक तरह से देखा जाए तो एक सामान्य तापमान पर हमारा मस्तिष्क और शरीर सबसे अच्छा काम करता है। लेकिन जैसे ही यह तापमान बढ़ता है मस्तिष्क पूरी तरह से शरीर के अन्य भागों को ठंडा अथवा संतुलित करने में लग जाता है और पूरी क्षमता से काम नहीं कर पाता है। इस वजह से मस्तिष्क के लिए नई जानकारी को संचारित करना, भावनाओं को संतुलित करना और आवेगों को नियंत्रित करना कठिन होता जाता है। हाल ही में शोधकर्ताओं ने अत्यधिक गर्मी की लहरों और मूड के बिगड़ते लक्षणों, चिंता विकारों, सिज़ोफ्रेनिया और यहां तक कि आत्महत्या के जोखिमों के बीच भी इस बदलते वातावरण का संबंध दिखाया है।
वर्तमान में हमारे पास ऐसे कुछ ही तरीके हैं जिनसे हमें पता चलता है कि जलवायु परिवर्तन हमारे दिमाग को नुकसान पहुंचा सकता है। सबसे महत्वपूर्ण और जरूरी बात यह कि हमारे मस्तिष्क की बनावट ऐसी है कि यह कई सालों तक किए गए नुकसान को छिपा सकता है। यही वजह है कि जब तक मरीज न्यूरोलॉजिस्ट की मदद लेने पहुंचते हैं, तब तक कुल तंत्रिका कोशिकाओं का 50% से अधिक हिस्सा मर चुका होता है और बीमारी एक अपरिवर्तनीय अवस्था में होती है जिसका इलाज लगभग असंभव है।
_______________________________________________________________________
Read Also : Monsoon special: Ayurvedic treatments and diet during the monsoon
________________________________________________________________________
गर्मी और मल्टीपल स्केलेरोसिस (जिसमें की तंत्रिका क्षति के परिणामस्वरूप मस्तिष्क और शरीर के बीच संपर्क टूट जाता है) के बिगड़ते लक्षणों के बीच एक स्पष्ट संबंध है। इससे भी बुरी बात यह है कि छोटे बच्चों और किशोरों के सक्रिय मस्तिष्क जो अतिसंवेदनशील होते हैं उन पर भी जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों के चलते ऐसे कार्यों को करने की क्षमता कम होती जा रही है जिसमें हाथ-आँख दोनों के समन्वय की आवश्यकता होती है, उनमें तंत्रिका विकास संबंधी विकार पैदा होता है। एक आंकड़े के अनुसार, बच्चों और किशोरों में 18 डिग्री से ऊपर औसत तापमान में 1 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि जो विकार पैदा करती है उससे 3.8% आत्महत्या के मामलों में वृद्धि होती है। यह भी देखने को मिला है कि हिट वेव के दौरान 15 से 64 वर्ष की आयु के लोगों में मारपीट और चोट लगने की घटनाओं में 13% की वृद्धि दर्ज हुई है।
जिस वातावरण और परिवेश में हम रह रहे हैं आए दिन जंगलों में आग लगना, चक्रवात आना, बाढ़ और सूखे की स्थिति बहुत ही सामान्य बात बन गई है। देखा जाए तो ये झटके केवल हमारे पर्यावरण को ही नुकसान नहीं पहुंचाते हैं बल्कि हमारी राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक व्यवस्था को भी कमजोर कर रहे हैं। अफगानिस्तान में लंबे समय तक युद्ध की स्थिति और फसलों के कम उत्पादन ने लोगों को गरीबी में धकेल दिया है। प्रशांत के कुछ छोटे द्वीपों में पूरे समुदायों को एक जगह से दूसरी जगह पर जाने अथवा विस्थापित होने पर मजबूर किया है। यह जलवायु परिवर्तन सूखे, बढ़ते तापमान और अन्य चरम स्थितियों के कारण दुनिया के कुछ हिस्सों को निर्जन बना सकता है। यह स्थिति संसाधनों के ह्रास, भुखमरी, गरीबी और अनियंत्रित जलवायु प्रवास की स्थिति में मानव का जीवित रहना वास्तविक और अपरिहार्य बना देगी। राष्ट्र विनाशकारी मौसम की स्थिति से निपटने के लिए जिस तरह से संघर्ष करते हैं, उसी तरह से संसाधनों और पर्यावरणीय गिरावट, जनसंख्या विस्थापन और विभिन्न अन्य जलवायु प्रेरित समस्याएं किसी भी समाज या देश के ताने-बाने को परेशान और बाधित कर सकती हैं। यह अल्पसंख्यकों, शरणार्थियों, धार्मिक और जातीय के हिंसक उत्पीड़न के लिए एक अनुकूल की बजाय आदर्श स्थिति है। जिससे निपटने के लिए हमें अभी से तैयार रहने और ठोस कदम उठाने की ज़रूरत है।
जलवायु संकट से सूखा पड़ने, जंगल में आग लगने, बाढ़ और तूफान जैसी चरम स्थिति उत्पन्न होती है, जिससे दुनिया भर में लोग भूख और कुपोषण के साथ साथ आर्थिक और सामाजिक अस्थिरता के बड़े जोखिम में होंगे। यह स्थिति अधिक संसाधनों वाले क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर प्रवासन को प्रेरित कर सकती है। इन स्थितियों ने सीरिया में गृहयुद्ध के विकास में योगदान दिया है। यह युद्ध 2011 में शुरू हुआ और अनुमानित चार लाख लोगों की मौत हुई, एक करोड़ से अधिक सीरियाई लोगों को अपने घरों से भागना पड़ा। 2006 से 2009 तक, सूखे ने लगभग 60% भूमि क्षेत्र को रेगिस्तान में बदल दिया, इससे अस्सी फीसदी मवेशियों की मौत हो गई। कम से कम 15 लाख लोगों ने अपने खेतों को छोड़ दिया और उन शहरों में चले गए जो पहले से ही एक करोड़ से अधिक इराकी शरणार्थियों के बोझ से दबे हुए थे। 2010 के अंत तक, सीरिया की शहरी आबादी 13.8 मिलियन थी, जो 2002 की तुलना में लगभग 50% अधिक थी।
यह विश्लेषणात्मक ढांचे हमें जलवायु परिवर्तन से जुड़े उन विभिन्न पर्यावरणीय कारकों को समझने में मदद कर सकते हैं जो सामूहिक हिंसा में योगदान कर सकते हैं। मुख्य रूप से फसली भूमि, जंगल, नदी के पानी और मछली की कमी जैसे पर्यावरण संसाधनों की कमी से गंभीर सामाजिक तनाव हो पैदा हो सकता है। जिसका नतीजा सांस्कृतिक और जातीय समूहों के बीच अशांति और अंत में आतंकवाद में बदल जाता है। इथियोपिया में, बायोमास ईंधन पर्यावरणीय संसाधन की कमी में बहुत ही ज्यादा योगदान देता है। इस पर थोड़ा और शोध ग्रामीण क्षेत्रों और निम्न-आय समूह वाले देशों में नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देने में सहायक हो सकता है। यह बच्चों की शिक्षा के लिए प्रकाश व्यवस्था, रसोई में महिलाओं के लिए जैव ईंधन, भोजन और दवाओं के लिए कोल्ड स्टोरेज सुविधा में सुधार करेगा। साथ ही यह घर के अंदर हवा में कमी, खाना पकाने से होने वाला प्रदूषण तथा सामूहिक हिंसा के जोखिम को भी कम करने में सहायक होगा।
_______________________________________________________________________
READ ALSO : THE ROLE OF MULTILATERAL LENDERS IN MINIMIZING CLIMATE CHANGE
_______________________________________________________________________
सन 2100 तक, समुद्र का स्तर 1990 के स्तर से 20 से 55 इंच ऊपर उठने की संभावना है। कुछ अध्ययनों से पता चलता है कि 2100 तक, यह 1.83 मीटर या छह फीट हो सकता है, लेकिन केवल अंटार्कटिका स्तर एक मीटर या 3.3 फीट से अधिक हो सकता है। दुनिया की बीस प्रतिशत आबादी तटीय क्षेत्रों में रहती है। यह स्थिति लोगों को अपने ही देशों में आंतरिक रूप से विस्थापित होने या पड़ोसी देशों में शरणार्थियों बनने के लिए मजबूर कर सकती है। समुद्र के स्तर का बढ़ना भोजन और ताजे पानी की कमी का कारण बनता है। जिसके परिणामस्वरूप, तमाम राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक व्यवधान उत्पन्न होकर हिंसा से जुड़ेंगे। हम इसे श्रीलंका में देख रहे हैं, कारण अलग है लेकिन प्रकृति समान है। जलवायु परिवर्तन या अधिक सटीक रूप से वैश्विक जलवायु परिवर्तन पृथ्वी पर जीवन को कई तरीकों से गहरे रूप से प्रभावित कर रहा है।
एक तरह से देखा जाए तो जलवायु परिवर्तन मूल रूप से विकास का मुद्दा है। हमें अपनी अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाना है और पीछे नहीं हटना है। लेकिन यह भी सच है कि हमारे ग्रह की स्थिति और चारों ओर होने वाली घटनाएं गहन आत्मनिरीक्षण की मांग करती हैं। कृत्रिम सभ्यता की स्थिति हर जगह प्रभावी प्रतीत होती है, जिससे विश्व की आबादी का एक बड़ा हिस्सा जीवन-निर्वाह संसाधनों तक पहुंच से वंचित रह जाता है। वर्तमान का यह आभासी सच ही वास्तविक सच बन है जहां संवेदनशीलता का कोई स्थान नहीं है। दुनिया को हर साल 51 अरब मीट्रिक टन ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन से शुद्ध शून्य तक जाना चाहिए। तभी वैश्विक तापमान में वृद्धि प्रबंधकीय स्तरों के भीतर रहती है। मुद्दों की प्राथमिकता के केंद्र में पैसा नहीं, इंसान होना चाहिए। हमें स्प्लर्ज सिंड्रोम का शिकार बनने से बचना चाहिए। हमें जो करना है वह कार्बन उत्सर्जन से वृद्धि को कम करना है।
Tags: #anxietydisorders, #climate, #climatechange, #climatecrisis, #environment, #getgreengetgrowing, #gngagritech, #greenstories, #nature, #refugees, #schizophrenia

