
निमोनिया स्वाश तंत्र का एक गंभीर रोग है जो कई प्रकार के सूक्ष्म रोगाणुओं के कारण पैदा होता है। इसके
इलाज में लापरवाही बरतने पर रोगी की जान भी जा सकती है। जैसा कि हम जानते है,मनुष्य के शरीर मे दो
फेफड़े होते है जो स्वास के रूप में ली गई वायु में से ऑक्सीजन अवशोषित करके खून तक पहुंचाते हैं तथा
खून में मौजूद हानिकारक कार्बन डाइऑक्साइड को शरीर से निकलते है।एक स्वस्थ फेफड़े में असंख्य
वायुकोष होते है जिसमे वायु भरे होते है ।
जब किसी भाग के वायुकोष में वायु के स्थान पर पानी जमा हो
जाता है तो इस अवस्था को निमोनिया कहा जाता है।फेफड़े का आक्रांत हिस्सा ठोस व निष्क्रिय हो जाता है
जिसके कारण रोगी को अनेको श्वास संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।रोगी की सांसें फूलने
लगती है ,सांस जल्दी जल्दी चलने लगती है ,तेज बुखार के साथ रोगी के छाती में दर्द भी होता है। फिर एक
दो दिनों के बाद रोगी को खांसी आना शुरू हो जाता है।शुरू में सूखी खांसी आती है ,फिर काफी बलगम आने लगता है।अगर ये बच्चो में हो तो पेट मे दर्द हो सकता है।बच्चा कमजोरी महसूस करता है,भूख कम लगती
है और उसकी सांसे तेज चलती है।
यह रोग बिना इलाज के ठीक नही होता। कई बार ये बीमारी काफी जटिल बन जाती हैं। जैसे:
- फेफड़े के झिल्ली में पानी भर जाना- एक स्वस्थ फेफड़े के ऊपर दो झिल्लियां होती है। निमोनिया की
गंभीर स्थिति में इन झिल्लियों के बीच पानी जमा हो जाता है।यदि समय रहते पानी को न निकाला जाए तो
फेफड़ा बेकार हो जाता है।
2.फेफड़ों में मवाद भर जाना- निमोनिया से ग्रसित कई मरीजो में फेफड़े के हिस्सों में रोगाणु बढ़कर मवाद
का फोड़ा भी बना देता है। - खून में मवाद भर जाना- इसे मेडिकल की भाषा मे सेप्टीसीमिया भी कहा जाता है। रोगाणुओं के खून में
प्रवेश कर जाने से कभी कभी स्थिति घातक हो जाती हैं।मरीजो को कंपकपी वाली तेज बुखार आती
है।जिगर, हड्डी में मवाद बनने का लक्षण दिखता है और ऐसी हालत में कभी कभी रोगी की मौत भी हो
जाती है। - फेफड़े के झिल्ली में मवाद भरना- मेडिकल की भाषा मे इसे एमपैमा भी कहते है।इस अवस्था तक मरीज
पहुंच जाए तो इलाज कठिन हो जाता है।इस अवस्था मे फेफड़े के ऊपर के दोनों झिल्लियों के बीच मवाद
बनने लगता है ।इसके कारण रोगी के छाती में उस ओर भारीपन व दर्द होता है।छाती की त्वचा लाल व गर्म
हो जाती है।वहां दबाने पर तीव्र वेदना होती है,तेज बुखार बना रहता है।उचित इलाज के अभाव में त्वचा पर
नासूर बन जाता है जो आगे जाकर खतरनाक बन जाता है। - फेफड़े का फेल होना- ऐसे रेस्पिरेटरी फेलियर भी कहा जाता है।जब दोनों फेफड़े गंभीर रूप से आक्रांत हो
जाते है या रोगी का एक फेफड़ा पहले से ही बेकार हो तथा दूसरा निमोनिया ग्रस्त हो जाये तो रोगी के खून में
ऑक्सिजन की कमी हो जाती है क्योंकि रोगग्रस्त फेफड़ा काम करना बंद कर देता है ।इसे फेफड़े का फेल
होना यानी रेस्पिरेटरी फेलियर कहा जाता है।इसमें रोगी की होंठ, जीभ, गाल, आंखों की झिल्ली,
नाखून,हथेली आदि सभी अंग नीले पड़ने लगते है ।रोगी बेचैन हो जाता है और छटपटाने लगता है और
अंततः उसकी मृत्यु हो जाती है।
आखिर क्यों होता है निमोनिया?
कारण- निमोनिया एक संक्रामक रोग है जो इन्फ्लूएंजा के वायरस, न्यूमोकोक्कस एवं हिमोफीलस आदि
कई तरह के सूक्ष्म रोगाणुओं के कारण उत्पन्न होते है ।
रोगी के खांसने पर उसके सांस के साथ ये रोगाणु निकल कर उसके करीब खड़े या बैठे स्वस्थ व्यक्ति के
शरीर मे सांस के साथ पहुंचकर उसे रोगी बना देता है।
कई बार तो निरोग व्यक्ति के गले मे मुहं में मौजूद बैक्टेरिया सोते समय सांस की नली में प्रवेश कर
व्यक्ति को रोगी बना देता है।
बुखार ग्रस्त बच्चे की पसली तेज चल रही हो तो उसके निमोनिया ग्रस्त होने की संभावना होती है।
निवारण: निमोनिया का निदान निम्नलिखित जांचों के द्वारा किया जाता है।
1.छाती का एक्सरे- निमोनिया की पहचान के लिए छाती का एक्स रे सबसे महत्वपूर्ण जांच हैं।इस जांच में
छाती का निमोनिया ग्रस्त भाग स्पष्ट दिखाई देता है।
- रक्त जांच- रोगी के शरीर मे श्वेत रक्त कणिकाओं की संख्या में वृद्धि हो जाती है।उनके अनुपात में भी
परिवर्तन हो जाता है।जिसका पता रक्त परीक्षण में हो जाता है।
3.बलगम की जांच – रोगी के बलगम की जांच करने पर उसमे रोग के रोगाणु पाए जाते है।इस जांच से सही
दवा में मदद मिलती है। - ब्लड कल्चर- रोगी में सेस्टिसिमिया की आशंका होने पर ब्लड कल्चर द्वारा रोगाणु की पहचान की जाती
है।यह जांच सिर्फ उन्ही रोगियों की कराई जाती है जो बहुत जटिल रूप से बीमार होते है।
इलाज: निमोनिया होने पर योग्य व अनुभवी चिकित्सक से इलाज कराना चाहिए।आम तौर एलोपैथ के
डॉक्टर रोगाणु नाशक एन्टीबायोटिक दवाएं देते है जैसे पेनिसिलिन, जेंटामाईसीन इत्यादि या बलगम को
गिला करने के लिए ब्रोम्हेक्सिन या अमोनियम क्लोराइड युक्त सिरप इत्यादि ।लेकिन यहाँ हम आयुर्वेद
चिकित्सा के जरिये उपचार की जानकारी देना चाहेंगे।
आयुर्वेदिक दवा इसलिए बेहतर है क्योंकि इसका साइड इफेक्ट्स नही होता।
मेंथी- 2 चाय की चम्मच मेंथी पाउडर एक गिलास ब्लैक टी में मिलाएं ,स्वाद के लिए उसमे एक चम्मच
चीनी भी डाल सकते है।इस से निमोनिया का प्रभाव कम होगा।
तुलसी-तुलसी के कुछ पौधों को मसलकर रस निकाल ले ,इसमें काली मिर्च का पाउडर मिलाये ।फिर इसे 6-
6 घंटे बाद चाटते रहे। निमोनिया का प्रभाव कम होगा।
पुदीना- पुदीने के काफी सारे पत्तियों का रस निकाल ले।फिर इसमें शहद मिलाएं। इसे एक एक घंटे के बाद
थोड़ा थोड़ा लेकर चाटते रहे ,निमोनिया का प्रभाव कम होगा।
लहसुन- लहसुन से शरीर का तापमान कम होता है। कहते है लहसुन का पेस्ट छाती पर मलने से काफी
फायदा मिलता है। हल्दी- हल्दी का उपयोग निमोनिया में काफी फायदेमंद है।गुनगुने पानी को हल्दी में मिलाकर पेस्ट बनाएं
और उसे छाती पर लेप लगाएं। इससे निमोनिया का सूजन दूर होगा।
इसके अलावा त्रिफला व अश्वगंधा भी निमोनिया में लाभदायक है।उपरोक्त सारे आयुर्वेदिक नुस्खे किसी
चिकित्सक के सलाह पर ही ले

