

देखा जाए तो भारत मे कोरोना का कहर उतना घातक नहीं है जितना प्रारंभ में बताया गया था। आंख मूँदकर
अंतरराष्ट्रीय मापदंडों को बिना फेरबदल भारत मे भी लागू करते रहने के नोकरशाही के रवैये ने देश को एक
खतरनाक मोड़ पर ला कर खड़ा कर दिया। सन 1991 में अपनी अर्थव्यवस्था खोल देने व ग्लोबलाइजेशन के
खेल का हिस्सा बनने के बाद से उतावली भारत सरकार व उसके नेताओं व नोकरशाही ने अपने आपको
रातोंरात ग्लोबल मान लिया। इसी कारण भारत केंद्रित व स्थानीय परिस्थितियों के अध्ययन के आधार पर
निर्णय लेने की प्रणाली ही हाशिए पर खदेड़ दी गयी। सरकारी स्तर न ही हमारी कोई विशिष्ट सोच बची न
ही भारत परक दृष्टि और न ही भारत केंद्रित दृष्टिकोण। कोई चाहता ही कहाँ है मौलिक भारत
बनाना।अमेरिका, चीन व सऊदी अरब के जूते चाटते हमारे सभी दलों के राजनेताओं ने बस एक ही काम
किया और वह था पूंछ हिलाकर इन आकाओं की जी हजूरी और उनसे मिले समर्थन व चांदी की जूती से
अपनी राजनीति की दुकान चलाना। किसी भी विचारधारा का राजनीतिक दल हो बस एक ही एजेंडा व एक
ही मिशन पर रहता है कि कैसे अधिक शिद्दत से अपने आकाओं के एजेंडे को भारत मे लागू करवाया जाए।
_______________________________________________________________________
READ ALSO : JADE PLANT BENEFITS | ADVANTAGES OF GROWING JADE PLANT
_______________________________________________________________________
इसीलिए भारत मे सरकार व समाज के बीच गहरी खाई है। देश की अधिकांश जनता तो रोज कमाने व रोज
खाने के स्तर पर गुजर बसर कर रही है और वह एक ही शब्द जानती है और वो है – “यस बॉस”। यह लोग
सोच से अमेरिकी हैं व चाइनीज माल के शौकीन है व तबलीगी जमात के साथ खड़े होने को तैयार रहते
हैं।कोरोना संकट के समय देश की जनता ने बिना कुछ सोचे समझे सरकार के लॉक डॉउन के फैसले पर यस
बॉस वाली मुहर लगा दी। इस यस बॉस कल्चर ने आज देश को बर्बादी के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया।
नरेंद मोदी के चमत्कारिक व्यक्तित्व व नेतृत्व से भी अब स्थितियां सुधरने वाली नहीं। 18 मई से जो
संक्षिप्त रूप से लॉक डॉउन खोला गया है उसके बाद कि स्थितियां बहुत ही डराने वाली हैं। देश के साढ़े चार
करोड़ दुकानदारों को चार दिन में ही समझ आ गया कि बाजार में वे मात्र सन्नाटे ही बेच रहे हैं और शाम को
पर्स में सन्नाटे भरकर ले जा रहे हैं व अगले कुछ महीने इन सन्नाटो के साथ ही जिंदगी गुज़ारनी पड़ेगी,
बशर्ते जिंदा रहे तो। जब दुकान पर माल बिक ही नहीं रह तो फैक्टरी क्या बनाएगी? अर्थव्यवस्था का चक्का
लंबे समय तक तेज नहीं घूमने वाला। कोरोना के डर से व कुछ लाख जिंदगी बचाने के नाम पर अब करोड़ों
लोगों की जिंदगी दांव पर लग गयी है। अनअपेक्षित रूप से शहरों से खदेड़े जा रहे मजदूरो की चीत्कार और
चीन से अमेरिकी कंपनियों को खींचकर भारत लाने की सरकार की कोशिशों के बीच सीमाओं पर गरजते
टैंक के शोर बड़े अनिष्ट का संकेत दे रहें हैं। विश्व युद्ध शुरू होने की आहट वैसे ही सारे न्यूज़ चैनल दे ही रहे
हैं।
_______________________________________________________________________
Read Also : Gardening 101: Jade Plant
________________________________________________________________________
कोरोना के भय के बीच करोड़ों लोग वैसे ही भय व घबराहट का शिकार है और लाखों कमजोर तो दम तोड़
चुके हैं वहीं अन्य बीमारियों से ग्रसित करोड़ों लोगों को कोई डॉक्टर देखने को तैयार नहीं। देश मे पुलिस राज
है व लोगों के मौलिक अधिकार छीन लिए गए हैं। मीडिया वैसे ही अपनी मौत मर चुका हे। ऐसा लगता है कि
देश को पूरी दुनिया के साथ ही सुनियोजित तबाही की ओर धकेला जा रहा है।
कोई है जो आवाज लगाएगा और सरकार को बताएगा कि सब लूट गया, बिखर गया, बर्बाद हो गया।
अनुज अग्रवाल
संपादक, डायलॉग इंडिया
http://www.dialogueindia.in

